Friday, 25 May 2012


विदिशा : मेरे शहर की कविता

१११ साल से एक बड़े मैदान में
खेली जा रही रामलीला
इसके आधे सैकड़ा किमी दूर एक गाँव में
पूजे जा रहे दशानन, शायद सदियों से

शांति की अहमियत समझती सभ्यता का
दुनिया के लिए पहला द्वार

पहाड़ खरोंच कठफ़ोड़वे की तरह
विराज दिए आदमकद वाराह
शेषशायी विष्णु और ढेर सी देव प्रतिमाएं आकार लेती गयीं
कठोर चट्टानी पत्थर में

साम्राज्यों, शासकों, मंदिरों, मूर्तियों को बनते बिगड़ते देख
बहती रही बेतवा अपने पूरे तेवर के साथ

सीना ताने सर उठाये खडा है
वैष्णव धर्म स्वीकारने की प्रशंसा में तामीर किया
यूनानी राजदूत अंततिलिकिस का हेलियाडोरस पिलर

दुनिया में पत्थर की सबसे मोहक मुस्कान
और जुबान पर शरबती लिए शालभंजिका

: सुदीप शुक्ल 

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