TAMASHA ...तमाशा

Tuesday, 22 May 2012

सारी रात


तुम रात देर से लौटे
उलटे करवट ही सोये
कुछ बोले बिन

चुभता रहा निशा भर नेह
मैं फिर भूखे ही सोयी
पिघला कुछ मुझ में
सारी रात


सुदीप शुक्ल
Posted by डॉ. सुदीप शुक्ल at 08:08
Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest

No comments:

Post a Comment

Newer Post Older Post Home
Subscribe to: Post Comments (Atom)

Blog Archive

  • ►  2013 (1)
    • ►  December (1)
  • ▼  2012 (6)
    • ▼  May (6)
      • आज के दिन तुम पर निसार होने की कोई तमन्ना नहीं ...
      • विदिशा : मेरे शहर की कविता १११ साल से एक बड...
      • कोई पागल कहेगा शून्य के भीतर की इबारत को चलो ब...
      • सारी रात तुम रात देर से लौटे उलटे करवट ही सोये...
      • फिर भी... चिड़ियों को नहीं सिखाया गया हैचहचहाना न...

About Me

डॉ. सुदीप शुक्ल
View my complete profile
Watermark theme. Powered by Blogger.